सब्र का फल मीठा होता है | हिंदी में जानकारी

सब्र का फल मीठा होता है | हिंदी में जानकारी

जानें सब्र का फल मीठा होता है अर्थ एक कहानी जो भारत देश के एक बड़े परसकोल नाम के गांव से लिया गया है. सफलता प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प एक छोटे से बालक ने अपने जीवन में किया था. धर्य एवं बड़ी लगन के साथ उसने एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की. शिक्षा की समाप्ति के बाद उसने कार्य ढूंढना शुरू किया, ताकि पारिवारिक जिम्मेदारी का निर्वाह हो सके.

इतनी अच्छी योग्यताएं होने के बावजूद उसका यह दुर्भाग्य था कि यूज़ कहीं कोई नौकरी नही मिला. काम की खोज में उसने जगह-जगह भटका, कई प्रयास किये लेकिन हर तरफ से उसे निराशा ही मिली, किन्तु उसकी खोज लगातार जारी रही और इस क्रिया से उसका आत्मविश्वाश उसे बल देता था. फिर तो जहां चाह की इतनी उत्कृष्ट हो वहां राह को साथ समंदर पार करके भी आना पड़ता है.

फिर एक दिन वह काम की खोज में निकल पड़ा फिर वह एक सेठ के बंगले में पहुंचा जो बहुत बड़ा व्यापारी था . युवक ने सोचा सेठ के पास कई काम हो सकते है. जिस समय वह सेठ के घर पहुंचा उस समय वे अपनी गाड़ी में बैठकर जाने की तयारी में थे.

युवक सेठ को आदरपूर्वक नमस्कार करके प्रार्थना के स्वर में बोला -“सेठ जी! मैं काम की तलाश में आप तक पहुंचा हूँ. यदि मेरे लायक आपके पास कोई काम हो तो मुझे अवश्य दिया जाए, मैं एम.ए.पास हूँ.

सेठ ने गहरी दृष्टि से युवक पर एक नजर डाली और उसकी उत्कंठा, मजबूरी का एहसास करते हुए बोले- “एक काम करो, ये जो समाने पत्थरों का ढेर पड़ा है इन्हें उठाकर इसी बगीचे के दुसरे कोने में रख दो. जब तुम्हारा कार्य पूरा हो जाये तब तुम मुझसे ऑफिस में आकर मिलना.

एक पल की देरी किए बिना वह युवक श्रम पूर्वक कार्य में जुट गया. एक-एक करके उसने वे सारे पत्थर उठाने प्रारंभ कर दिए. बड़ी लगन एवं कड़ी मेहनत के सह उसने सेठ के द्वारा बताए गए स्थान पर वे सारे पत्थर रख दिए. लगभग 4 घंटे में उसका यह कार्य पूर्ण हो गया तब वह सेठ के कार्यालय पहुंचा और कार्य पूरा हो जाने की सुचना दी.

सेठ ने युवक को बुलाकर पूछा – “यह काम हो गया, क्या तुम और भी काम करना चाहते हो?” उसने विनम्र स्वर में कहा – “जी! मैं काम करना चाहता हूँ. सेठ ने उसके साहस और धर्य की परीक्षा लेने के लिए कहा अब तुम उन पत्थरों को उसी स्थान पर रख दो जहां से उठाये थे.

सेठ का आदेश पाकर युवक पुनः सेठ के बंगले पर आया और पुरे उत्साह के साथ काम करने लग गया. उसका लक्ष्य मात्र एकनिष्ठाता के काम करना था. काम क्या है कैसा है इस ओर उसका तनिक ध्यान नही था. वह पूर्ण लगन के साथ कार्य में जुट गया.

उसका लक्ष्य मात्र एकनिष्ठाता के काम करना था. काम क्या है कैसा है इस ओर उसका तनिक ध्यान नही था. वह पूर्ण लगन के साथ कार्य में जुट गया. शाम तक वह काम पूरा हुआ और वह ऑफिस पहुंचा.

सेठ ने मुस्कुराते हुए कहा “यदि और काम करना चाहते हो तो कल आ जाना. इतना कहकर सेठ ने उसे सौ रूपये दिए.

दुसरे दिन भी ठीक वही कहानी दोहराई गई, आज भी युवक को उन्होंने वही काम बताया और उसने धीरज से काम पूरा किया. चाहे काम का कोई सिर – पैर उसे समझ में नहीं आ रहा था फिर भी वह प्रसन्नतापूर्वक परिश्रम करता रहा.

सायंकाल सेठ ने पूछा – “क्या और काम करना चाहते हो?” उसने कहा, जी ! मै निरंतर काम करना चाहता हूँ. श्रम करना मेरा लक्ष्य है अतः मै हर परिस्थिति में काम करने को तैयार हूँ. उसके हाँ कहने पर सेठ ने कहा – “क्या यही काम करोगे?” उसने कहा – “जो आप बताओगे वही करूँगा. यदि आप ये काम दुबारा बताओगे तो मुझे उसे भी पुरे उत्साह के साथ करने में कोई आपत्ति नहीं है.

इतना सुनते ही सेठ ने कुर्सी से उठकर युवक की पीठ थपथपाते ही कहा – शाबाश बेटे! मै तुम्हारे धर्य की परीक्षा ले रहा था. कल से तुम मेरे ऑफिस के मेनेजर नियुक्त किए जाते हो. यह सुनकर उसके चेहरे पर मुस्कुराहट फ़ैल गई. उसका रोम-रोम हर्षित हो गया और वह दृष्टी से झांकता हुआ उनके चरणों में झुक गया.

युवक बड़ी प्रसंता के साथ घर पहुंचकर पत्नी से सारी बात बताकर अंत में बोला – “धर्य का फल मीठा होता है”.

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